सोमवार, 21 फ़रवरी 2011
बुधवार, 26 जनवरी 2011
बहुत उदास आज जीवन है
घर के अन्दर एक नया घर
दीवारों के साथ बटा मन
संबंधों में आया कैसा सूनापन है
बहुत उदास आज जीवन है
सुलझे सुलझे थे जो रिश्ते
नाहक ही क्यों हमसे उलझे
ताना बना टूट ना जाये डरता मन है
बहुत उदास आज जीवन है
माँ बैठी है आस लगाये बेटा फिर भी घर ना आये
त्योहारों पर सूना घर रीता आंगन है
बहुत उदास आज जीवन है
बूढ़ा बाप कम पर जाये
तब घर में चूल्हा जल पाए
दो जून रोटी में खटता सारा दिन है
बहुत उदास आज जीवन है
महेंद्र भार्गव
गंज बासोदा
दीवारों के साथ बटा मन
संबंधों में आया कैसा सूनापन है
बहुत उदास आज जीवन है
सुलझे सुलझे थे जो रिश्ते
नाहक ही क्यों हमसे उलझे
ताना बना टूट ना जाये डरता मन है
बहुत उदास आज जीवन है
माँ बैठी है आस लगाये बेटा फिर भी घर ना आये
त्योहारों पर सूना घर रीता आंगन है
बहुत उदास आज जीवन है
बूढ़ा बाप कम पर जाये
तब घर में चूल्हा जल पाए
दो जून रोटी में खटता सारा दिन है
बहुत उदास आज जीवन है
महेंद्र भार्गव
गंज बासोदा
शुक्रवार, 14 जनवरी 2011
गणतंत्र
जन गण पर हावी हुआ राजनीती का तंत्र
जनता फिर भी चाव से मन रही गणतंत्र
नैतिकता कुंठित हुई
मानवता लाचार
गावं गावं में फैलता
आतंकी व्यापार
अर्थहीन सी जिंदगी कुछ ना सूझे बात
दहशत में हैं बीतते दिन तो चाहे रात
माती अब खोने लगी उसकी मधुर सुगंध
सांसों में घुलने लगी
अब बारूदी गंध
बेइमानो की भीड़ में जनता है खामोश
इन को हम ने खुद चुना अब किसको दे दोष
महेंद्र भार्गव
गंज बासोदा
जनता फिर भी चाव से मन रही गणतंत्र
नैतिकता कुंठित हुई
मानवता लाचार
गावं गावं में फैलता
आतंकी व्यापार
अर्थहीन सी जिंदगी कुछ ना सूझे बात
दहशत में हैं बीतते दिन तो चाहे रात
माती अब खोने लगी उसकी मधुर सुगंध
सांसों में घुलने लगी
अब बारूदी गंध
बेइमानो की भीड़ में जनता है खामोश
इन को हम ने खुद चुना अब किसको दे दोष
महेंद्र भार्गव
गंज बासोदा
गुरुवार, 13 जनवरी 2011
शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010
दिया जलता है
तेरी कमाई से घर कैसे मेरा चलता
जिंदगी आ के ठहर जाती है उन पलकों पे
घर जब भी किसी जरुरत को तलब करता है
हर एक अश्क माँ का मुझसे सवाल करता है..........
ग़मों कि आंच पे पकती है मेरे घर कि रोटी
आग चूल्हे में नहीं दिल से धुआं निकलता है
कभी तो बदलेंगे मेरे घर के हालत
बस इसी आश में मंदिर पे दिया जलता है
हर एक अश्क माँ का मुझसे सवाल करता है
महेंद्र भार्गव
गंज बासोदा
मंगलवार, 21 दिसंबर 2010
गुरुवार, 9 दिसंबर 2010
व्यर्थ गवाया
नाम कमाया जीवन भर ना नामा पाया
सब कहते है जीवन तू ने व्यर्थ गवाया
अरे हम तो ठहरे निपट अनाड़ी
क्या समझेंगे दुनियादारी
गिरगिट जैसा रंग स्वाभाव में भर ना पाया
सब कहते है जीवन तू ने व्यर्थ गवाया
ऊँची नीची रह चले है आड़े टेड़े होग मिले है
अपशब्दों के बदले में आभार जताया
सब कहते है जीवन तू ने व्यर्थ गवाया
महेंद्र भार्गव
गंज बासोदा
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